ईरान की पड़ोसी देशों को चेतावनी और बढ़ता मध्य पूर्व संकट

ईरान की पड़ोसी देशों को चेतावनी और बढ़ता मध्य पूर्व संकट

मध्य पूर्व में हवाएं बदल चुकी हैं और अब ये सिर्फ जुबानी जंग नहीं रही। डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकियों के बाद तेहरान ने अपने तेवर साफ कर दिए हैं। ईरान ने सीधे तौर पर अपने पड़ोसी अरब देशों को अल्टीमेटम थमा दिया है कि अगर उनकी धरती या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए हुआ, तो परिणाम पहले से चार गुना ज्यादा घातक होंगे। ये कोरी धमकी नहीं है बल्कि एक बदलती युद्ध नीति का संकेत है। पश्चिम और खाड़ी देशों के बीच संतुलन अब धागे से लटक रहा है।

ईरान का ये रुख सीधे तौर पर ट्रंप की उन चेतावनियों के जवाब में आया है जिनमें उन्होंने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने की संभावना जताई थी। तेहरान अब ये मानकर चल रहा है कि सिर्फ इजरायल ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोस में बैठे अमेरिकी दोस्त भी उसके लिए खतरा बन सकते हैं। ये डर जायज है या नहीं, ये बहस का विषय हो सकता है, लेकिन ईरान की तैयारी बता रही है कि वो अब बैकफुट पर रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है। Expanding on this theme, you can also read: The Red Circle on the Calendar.

ट्रंप की वापसी और ईरान का बढ़ता दबाव

वाशिंगटन में सत्ता के गलियारों में ट्रंप की धमक गूंजते ही मध्य पूर्व की बिसात बदल गई है। ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' वाली नीति ईरान को अच्छी तरह याद है। जब उन्होंने परमाणु समझौते से हाथ खींच लिए थे और कासिम सुलेमानी को निशाना बनाया था, तब ईरान की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों को गहरा झटका लगा था। अब दोबारा ट्रंप की संभावित आक्रामकता को देखते हुए ईरान ने अपनी रक्षा पंक्ति को सीमाओं से बाहर धकेल दिया है।

ईरान का साफ कहना है कि अगर कोई देश अपनी जमीन इजरायल या अमेरिका को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए देता है, तो उसे दुश्मन का पक्षकार माना जाएगा। तेहरान के सैन्य कमांडरों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके पास अब ऐसी मिसाइलें और ड्रोन तकनीक है जो पूरे क्षेत्र को अपनी जद में ले सकती है। ये चार गुना ज्यादा हमले वाली बात दरअसल उनकी नई 'डिटेरेंस' यानी प्रतिरोधक क्षमता की तरफ इशारा करती है। वे बताना चाहते हैं कि उनके पास खोने के लिए कम और तबाह करने के लिए बहुत कुछ है। Experts at Associated Press have provided expertise on this matter.

पड़ोसी देशों की मजबूरी और दोहरी चाल

जॉर्डन, यूएई, कतर और सऊदी अरब जैसे देश इस समय सबसे मुश्किल दौर में हैं। एक तरफ उनके सुरक्षा संबंध अमेरिका के साथ हैं, तो दूसरी तरफ वे ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना चाहते हैं। ईरान को पता है कि इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द हैं। अगर इन अड्डों से एक भी विमान उड़ता है, तो ईरान की नजर में वो देश सीधे युद्ध में शामिल हो जाता है।

सऊदी अरब और ईरान के बीच हालिया कूटनीतिक सुधारों के बावजूद अविश्वास की गहरी खाई अभी भी मौजूद है। ईरान ने ये अल्टीमेटम देकर पड़ोसी देशों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे अमेरिका की सुरक्षा छतरी के बदले अपनी खुद की तबाही का जोखिम उठाएंगे? खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तेल और पर्यटन पर टिकी है। ईरान का एक भी बड़ा मिसाइल हमला इन देशों को दशकों पीछे धकेल सकता है।

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क्या वाकई चार गुना तेज होगा हमला

सैन्य विशेषज्ञों की मानें तो ईरान की ये 'चार गुना' वाली बात कोई हवा-हवाई आंकड़ा नहीं है। पिछले कुछ सालों में ईरान ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता में भारी इजाफा किया है। हिजबुल्ला, हूतियों और इराक में मौजूद प्रॉक्सी गुटों के जरिए ईरान एक साथ कई मोर्चों पर हमला करने की ताकत रखता है। अगर ईरान अपनी पूरी ताकत झोंकता है, तो क्षेत्र का एयर डिफेंस सिस्टम शायद उसे पूरी तरह रोक न पाए।

ईरान का दावा है कि उसके पास अब ऐसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं जो रडार की पकड़ में नहीं आतीं। हालांकि इन दावों की सच्चाई पर इजरायल और अमेरिका हमेशा शक करते हैं, लेकिन जोखिम इतना बड़ा है कि कोई भी इसे हल्के में नहीं लेना चाहता। युद्ध की स्थिति में ईरान का पहला निशाना ऊर्जा के स्रोत और बंदरगाह होंगे, जिससे पूरी दुनिया की सप्लाई चेन ठप हो जाएगी।

अमेरिका और इजरायल का अगला कदम क्या होगा

इजरायल के लिए ईरान का ये अल्टीमेटम उसके उन प्लान्स में अड़ंगा है जो वो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बना रहा था। इजरायल चाहता है कि उसे अरब देशों का पूरा समर्थन मिले, लेकिन ईरान की धमकी ने इन देशों के पैर पीछे खींचने पर मजबूर कर दिए हैं। ट्रंप की रणनीति अब सिर्फ धमकियों तक सीमित रहेगी या वो सच में कोई बड़ा सैन्य एक्शन लेंगे, ये आने वाले महीनों में साफ होगा।

फिलहाल तेहरान ने अपनी मिसाइल यूनिट्स को हाई अलर्ट पर रखा है। उनका मैसेज लाउड और क्लियर है। वे अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेंगे जहां वे सिर्फ हमलों को सहते थे और फिर जवाबी कार्रवाई करते थे। अब वे 'प्री-एम्पटिव' यानी हमले से पहले हमले की सोच पर काम कर रहे हैं।

क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए अब कतर और ओमान जैसे देशों की भूमिका बढ़ गई है। वे पर्दे के पीछे से तेहरान और वाशिंगटन के बीच पुल बनने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यही है कि एक छोटी सी गलती भी इस पूरे इलाके को ऐसी आग में झोंक सकती है जिससे निकलना नामुमकिन होगा।

पड़ोसी देशों को अब ये तय करना है कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी सैन्य अभियान के लिए होने देंगे या नहीं। अगर वे तटस्थ रहते हैं, तो शायद वे इस संभावित तबाही से बच जाएं। लेकिन अगर वे दबाव में आए, तो ईरान के 'चार गुना' हमले वाली चेतावनी हकीकत में बदलते देर नहीं लगेगी। अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत करना और कूटनीतिक रास्तों को खुला रखना ही उनके पास फिलहाल एकमात्र विकल्प बचा है।

JP

Jordan Patel

Jordan Patel is known for uncovering stories others miss, combining investigative skills with a knack for accessible, compelling writing.