मुख्यधारा की मीडिया इस हेडलाइन से भरी पड़ी है कि भारतीय युवा जापानी भाषा सीखकर जापान में बुजुर्गों की देखभाल करने के लिए बेताब हैं। इसे एक 'विन-विन' स्थिति के रूप में पेश किया जा रहा है: जापान को उसकी घटती आबादी के लिए सस्ते मजदूर मिल रहे हैं, और भारतीयों को विदेश में एक शानदार करियर।
यह पूरा नैरेटिव एक सफेद झूठ है। Building on this theme, you can also read: The Silent Takeover of the Boardroom Floor.
जो लोग इस बहकावे में आ रहे हैं, वे वास्तविकता से कोसों दूर हैं। सत्य यह है कि केयरगिविंग (बुजुर्गों की देखभाल) कोई दीर्घकालिक करियर नहीं बल्कि एक आधुनिक बंधुआ मजदूरी का जाल है, जहां भारतीय युवाओं का शोषण तय है। अगर आप या आपका कोई परिचित जापानी भाषा (N4 या N3 लेवल) सिर्फ इसलिए सीख रहा है ताकि जापान जाकर वृद्धों के डायपर बदल सके, तो रुकिए। आप एक बड़े आर्थिक और मानसिक संकट की ओर बढ़ रहे हैं।
जापान का जनसांख्यिकीय संकट आपका अवसर नहीं, उनका मजबूरी का सौदा है
जापान में बुजुर्गों की संख्या दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है। वहां की 30% से अधिक आबादी 65 वर्ष से ऊपर है। स्थानीय जापानी युवा इस क्षेत्र में काम नहीं करना चाहते। क्यों? क्योंकि इसमें काम के घंटे बहुत ज्यादा हैं, शारीरिक श्रम अत्यधिक है, और वेतन जापान के अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहद कम है। Experts at Harvard Business Review have shared their thoughts on this trend.
जब जापानी नागरिक खुद इस काम को लात मार रहे हैं, तब वहां की सरकार ने 'स्पेसिफाइड स्किल्ड वर्कर' (SSW) और 'टेक्निकल इंटर्न ट्रेनिंग प्रोग्राम' (TITP) जैसे रास्तों को खोला। यह कोई भारत के प्रति उनका प्रेम नहीं है। यह उनकी मजबूरी है। वे अपनी बूढ़ी आबादी का बोझ उठाने के लिए तीसरी दुनिया के देशों से सस्ता श्रम आयात कर रहे हैं।
मैंने वैश्विक श्रम प्रवासन (Global Labour Migration) के पैटर्न को सालों से देखा है। जब भी कोई विकसित देश किसी खास क्षेत्र के लिए अचानक अपने दरवाजे खोलता है और भारी विज्ञापन करता है, तो समझ जाइये कि वह क्षेत्र उस देश के अंदर पूरी तरह से टूट चुका है।
भाषा सीख लेना सांस्कृतिक अलगाव को नहीं मिटा सकता
कोचिंग सेंटर आपको यह समझाते हैं कि मिनना नो निहोंगो (Minna no Nihongo) रट लो, JLPT पास कर लो और तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी। वे आपको जापानी व्याकरण तो सिखा देंगे, लेकिन वे आपको उस अकेलेपन और सामाजिक अलगाव के लिए तैयार नहीं कर सकते जो जापान की कार्य संस्कृति का हिस्सा है।
जापान एक बेहद समरूप (homogeneous) समाज है। आप चाहे कितनी भी अच्छी जापानी बोल लें, आप हमेशा एक 'गाइजीन' (विदेशी) ही रहेंगे। बुजुर्गों की देखभाल करने वाले कार्यस्थलों पर मानसिक तनाव का स्तर चरम पर होता है। डिमेंशिया और अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों को संभालना सिर्फ शारीरिक काम नहीं है; यह आपकी आत्मा को निचोड़ लेता है। जब आप दिन के 12 घंटे एक ऐसे माहौल में बिताते हैं जहां कोई आपसे खुलकर बात करने वाला नहीं है, तो भाषा के सर्टिफिकेट धरे के धरे रह जाते हैं।
आर्थिक हकीकत: आंकड़े जो आपको नहीं बताए जा रहे
आइए गणित समझते हैं, क्योंकि भावनाएं बिल नहीं चुकातीं।
एक औसत एसएसडब्ल्यू (SSW) केयरगिवर को जापान में लगभग 1,80,000 से 2,20,000 येन प्रति माह मिलते हैं। सुनने में यह रकम बड़ी लगती है (लगभग 1 से 1.2 लाख रुपये)। लेकिन इसके पीछे छिपे खर्चों को देखिए:
- टैक्स और सोशल सिक्योरिटी: वेतन का लगभग 20-25% हिस्सा सीधे कट जाता है।
- आवास और भोजन: जापान में रहने की लागत (Cost of Living) आसमान छू रही है। एक छोटे से कमरे का किराया और बुनियादी खाना आपके बचे हुए वेतन का आधा हिस्सा खा जाएगा।
- एजेंसी की फीस: भारत में बैठे रिक्रूटर्स और जापान के सुपरवाइजर संगठन (Implementing Organizations) आपसे मोटी रकम वसूलते हैं, जिसे चुकाने में ही शुरुआती एक-दो साल निकल जाते हैं।
सब कुछ काट-पीटकर एक भारतीय युवा बमुश्किल 40,000 से 50,000 रुपये बचा पाता है। क्या इतनी सी रकम के लिए अपने देश, परिवार और मानसिक शांति को दांव पर लगाना समझदारी है?
करियर का अंत: आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं
इस कड़वे सच को स्वीकार कीजिए: केयरगिविंग एक 'डेड-एंड जॉब' है। इसमें कोई वर्टिकल ग्रोथ नहीं है।
अगर आप पांच साल जापान के किसी ओल्ड-एज होम में बिताते हैं, तो पांच साल बाद आपकी प्रोफाइल क्या होगी? आप सिर्फ एक केयरगिवर रहेंगे। आप आईटी, कॉर्पोरेट, या किसी अन्य उच्च-भुगतान वाले उद्योग में स्विच नहीं कर सकते क्योंकि आपके पास प्रासंगिक कौशल (relevant skills) नहीं होगा।
इसके विपरीत, यदि कोई युवा उतनी ही मेहनत भारत में किसी तकनीकी कौशल, डेटा एनालिटिक्स, या सेल्स में करे, तो पांच साल में उसका करियर ग्राफ जापान के उस केयरगिवर से कहीं आगे निकल जाएगा। जापान का अनुभव आपको एक ऐसी स्किल सेट में बांध देता है जिसकी मांग भारत वापस आने पर न के बराबर है। भारत में वृद्धों की देखभाल का असंगठित बाजार है जो आपको जापान से लौटने के बाद नाममात्र का वेतन भी नहीं देगा।
विकल्प क्या है? अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाएं
यदि आपको जापानी भाषा सीखनी ही है, तो उसका उपयोग इस तरह के कड़े शारीरिक श्रम वाले कामों के लिए मत कीजिए।
- आईटी और बिजनेस ट्रांसलेशन: जापानी कंपनियों को द्विभाषी (bilingual) इंजीनियरों और प्रबंधकों की भारी जरूरत है। N2 या N1 लेवल की भाषा सीखें और आईटी सेक्टर में कदम रखें।
- भारत में स्थित जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनियां: गुरुग्राम, बेंगलुरु और चेन्नई में सैकड़ों जापानी कंपनियां हैं जिन्हें ऐसे लोगों की तलाश है जो उनकी संस्कृति और भाषा को समझते हों। यहां काम करके आप जापान से बेहतर लाइफस्टाइल और करियर ग्रोथ पा सकते हैं।
कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को निशाना बनाना और उन्हें यह सपना बेचना कि जापान में बुजुर्गों की सेवा करना एक स्वर्णिम अवसर है, एक सुनियोजित व्यवसाय बन चुका है। भाषा सिखाने वाले संस्थान और प्लेसमेंट एजेंसियां इस धंधे से करोड़ों कमा रही हैं, जबकि मैदान पर पसीना बहाने वाला युवा अंततः खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
इस व्यवस्था को चुनौती देने का समय आ गया है। जापान को अपनी बूढ़ी आबादी संभालने के लिए सस्ते मजदूरों की जरूरत हो सकती है, लेकिन भारत के युवाओं को अपनी क्षमता को इतने सस्ते दाम पर बेचने की कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए। अपने कौशल की कीमत पहचानिए, भेड़चाल का हिस्सा मत बनिए।